बेमक़्सद तन्हा मरने से तो, तुम पर मरना अच्छा है
तुम्हारी ज़मीं पर इश्क़ का मेरा, पेड़ लगाना अच्छा है

अच्छे बुरे की बात नहीं, ये सीखा है पैमानों से
तेरे ग़म में पीने से, तेरे साथ ही पीना अच्छा है

वक्त-ए-रुख़्सत गिला करुँ, मैं एसा भी ख़ुद्दार नहीं
मीठी यादों की ख़ातिर, मेरा सर झुकाना अच्छा है

मैंने चाहा, क्योंकर चाहा, तेरी ख़ता या मेरा भरम
वो बातें जो दिल ना समझे, ख़ुद को समझाना अच्छा है

तुझ को छू कर पुरवाई, गर मेरी गली से गुजरे तो
उन बेमौसम बरसातों में , आँसु बहाना अच्छा है

अपने सितम और मेरे ज़ब्त पर, जो कभी शरमिन्दा हो जाओ
उजड़ी सूनी किसी कब्र पर, इक शमाँ जलाना अच्छा है
(ज़ब्त : सहनशीलता (tolerance))

कभी जो हुश्न-ए-चाँद पर, मैंने लिखी कोई गज़ल
वो छत पे चाँद के रूबरू, तेरा सजना सँवरना अच्छा है
(हुश्न-ए-चाँद: चाँद की ख़ूबसुरती, रूबरू : सामने(in front))

तेरे झुठे कसमे वादों की ता उम्र हिफ़ाज़त की मैंने
अब मरने से पहले गँगा में, तेरे ख़त बहाना अच्छा है
(ता उम्र : पुरी उम्र, हिफ़ाज़त : रक्षा)

गिरिजाघर, मस्जिद, शिवालय, रिन्द ,वाइज़ और मदिरालय
इन सच्ची झुठी बातों से , दिल को बहलाना अच्छा है
(रिन्द : शराबी, वाइज़ : उपदेशक)

गुरूर-ए-हुश्न, नाज़-ओ-अदा, और कनखीयों से मुझे दख कर
चेहरे से मगरुर लटों को, यकलख़्त हटाना अच्छा है
(गुरूर-ए-हुश्न : ख़ूबसुरती का गुरूर, यकलख़्त : अचानक(झटके से))

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sharma.nishu@gmail.com

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